गणेश जयंती 2026 – शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा, मंत्र, आरती और संपूर्ण जानकारी
गणेश जयंती, जिसे माघी गणेश जयंती या विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है, भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव का पावन पर्व है। यह पर्व विशेष रूप से महाराष्ट्र, कोंकण तथा भारत के अनेक भागों में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन विधिपूर्वक गणपति पूजन करने से जीवन के सभी विघ्नों का नाश होता है और बुद्धि, समृद्धि एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
🗓️ गणेश जयंती 2026 – तिथि और दिन
- पर्व तिथि: 22 जनवरी 2026, गुरुवार
- चतुर्थी तिथि प्रारंभ: रात्रि 02:47 बजे
- चतुर्थी तिथि समाप्त: 23 जनवरी रात्रि 02:28 बजे
शास्त्रानुसार मध्याह्न काल में भगवान गणेश का जन्म हुआ था, इसलिए इसी दिन मध्याह्न समय में पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
⏰ गणेश जयंती 2026 शुभ पूजा मुहूर्त
शुभ पूजा समय: सुबह 11:29 बजे से दोपहर 01:37 बजे तक
इस अवधि में गणपति पूजन, मंत्र जाप और व्रत कथा का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
🕉️ गणेश जयंती का धार्मिक महत्व
भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि के दाता और शुभ आरंभ के अधिपति कहा जाता है। किसी भी मांगलिक कार्य से पहले गणपति पूजन करने की परंपरा सनातन धर्म में प्राचीन काल से चली आ रही है।
माघ शुक्ल चतुर्थी को भगवान गणेश का अवतरण माता पार्वती के संकल्प से हुआ था, ताकि वे संसार के भक्तों के सभी संकटों का निवारण करें।
🙏 गणेश जयंती पूजा विधि (Step-by-Step)
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें।
- भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- दीप, धूप और पुष्प अर्पित करें।
- दूर्वा घास और मोदक का भोग लगाएं।
- निम्न मंत्रों का जाप करें:
ॐ गं गणपतये नमः
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
- गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करें।
- अंत में गणेश आरती करें।
📖 गणेश जयंती व्रत कथा (संक्षेप)
पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर की उबटन से एक बालक की रचना कर उसे द्वारपाल नियुक्त किया। शिवजी के आगमन पर उस बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोका। क्रोधित शिवजी ने उसका मस्तक काट दिया। बाद में पार्वती के शोक से व्यथित होकर शिवजी ने हाथी का मस्तक लगाकर बालक को पुनर्जीवित किया और उसे गणपति का पद प्रदान किया। तभी से वे प्रथम पूज्य देव कहलाए।
🎶 गणेश जी की आरती
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
आरती के बाद प्रसाद सभी में वितरित करें।
🍬 गणेश जयंती भोग और प्रसाद
- मोदक
- लड्डू
- दूर्वा घास
- नारियल
- फल
भगवान गणेश को मोदक अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए इस दिन मोदक का विशेष भोग लगाया जाता है।
🌙 चंद्र दर्शन निषेध
गणेश जयंती के दिन चंद्र दर्शन नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा देखने से मिथ्या दोष लग सकता है।
✨ गणेश जयंती पर विशेष उपाय
- 108 बार “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र जाप करें।
- दूर्वा अर्पित करें।
- पीले वस्त्र धारण करें।
- जरूरतमंद को भोजन कराएं।
🔱 निष्कर्ष
गणेश जयंती 2026 का पावन पर्व भगवान गणपति की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर है। इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से की गई पूजा से सभी बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में सुख, शांति एवं सफलता प्राप्त होती है।
🕉️ श्री गणेश जी के प्रमुख मंत्र
बीज मंत्र:
ॐ गं गणपतये नमः ॥
वक्रतुण्ड मंत्र:
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
सिद्धि मंत्र:
ॐ गं गणपतये सर्वकार्य सिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा ॥
🙏 श्री गणेश जी की संपूर्ण आरती
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
एकदन्त, दयावन्त, चार भुजाधारी ।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
पान चढ़े, फूल चढ़े, और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया ।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
📖 श्री गणपति अथर्वशीर्ष (शुद्ध पाठ)
ॐ नमस्ते गणपतये ।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ।
त्वमेव केवलं कर्तासि ।
त्वमेव केवलं धर्तासि ।
त्वमेव केवलं हर्तासि ।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ।
त्वं साक्षादात्मासि नित्यम् ॥१॥
ऋतं वच्मि । सत्यं वच्मि ॥२॥
अव त्वं मां । अव वक्तारं । अव श्रोतारं ।
अव दातारं । अव धातारं । अवानूचानमव शिष्यम् ॥३॥
अव पश्चात्तात् । अव पुरस्तात् । अवोत्तरात्तात् ।
अव दक्षिणात्तात् । अव चोर्ध्वात्तात् । अवाधरात्तात् ।
सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात् ॥४॥
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः ।
त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममयः ।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोसि ।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥५॥
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते ।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति ।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति ।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति ।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः ।
त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥६॥
त्वं गुणत्रयातीतः ।
त्वं अवस्थात्रयातीतः ।
त्वं देहत्रयातीतः ।
त्वं कालत्रयातीतः ।
त्वं मूलाधार स्थितोऽसि नित्यम् ॥७॥
त्वं शक्तित्रयात्मकः ।
त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् ।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुः ।
त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम् ॥८॥
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम् ।
अनुस्वारः परतरः । अर्धेन्दु लसितम् ।
तारेण ऋद्धम् । एतत्तव मनुस्वरूपम् ॥९॥
गकारः पूर्वरूपं । अकारो मध्यरूपम् ।
णकारोऽन्त्यरूपम् । बिन्दुरुत्तररूपम् ।
नादः सन्धानम् । संहिता संधिः ।
सैषा गणेशविद्या । गणक ऋषिः ।
निचृद्गायत्री छन्दः । गणपतिर्देवता ।
ॐ गं गणपतये नमः ॥१०॥
एकदन्ताय विद्महे । वक्रतुण्डाय धीमहि ।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥११॥
एतदथर्वशीर्षं योऽधीते । स ब्रह्मभूयाय कल्पते ।
स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते । स सर्वत्र सुखमेधते ।
स पंचमहापापात् प्रमुच्यते । सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति ।
संध्यामधीयानो उभयकृतं पापं नाशयति ।
स सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ।
धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति । इदमथर्वशीर्षं ॥१२॥
॥ इति श्री गणपति अथर्वशीर्ष समाप्त ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥


