सिंहगढ़ किला महाराष्ट्र के पुणे जिले में सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला पर स्थित एक ऐतिहासिक दुर्ग है। यह किला मराठा इतिहास के सबसे प्रेरणादायक बलिदानों में से एक — वीर तानाजी मालुसरे के पराक्रम — के कारण अमर हो गया। 1670 ईस्वी में इसी किले को जीतने के लिए तानाजी ने अपने प्राण न्योछावर किए, और तभी से यह दुर्ग ‘सिंहगढ़’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
इस किले का प्राचीन नाम ‘कोंढाणा’ था। यह मुग़ल सेनाओं के नियंत्रण में था और पुणे क्षेत्र पर उनकी पकड़ बनाए रखने का प्रमुख केंद्र था। शिवाजी महाराज के लिए यह दुर्ग सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे पुणे और आसपास के प्रदेशों की सुरक्षा सुनिश्चित होती थी।
1670 में शिवाजी महाराज ने यह दुर्ग पुनः स्वराज्य में शामिल करने का निश्चय किया। इस अभियान का नेतृत्व वीर तानाजी मालुसरे को सौंपा गया। अत्यंत दुर्गम चट्टानों पर रात के अंधेरे में गोरपड (घोरपड छिपकली) की सहायता से दीवार चढ़कर मराठा सैनिकों ने किले में प्रवेश किया। भीषण युद्ध हुआ, जिसमें तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए, परंतु किला जीत लिया गया। जब शिवाजी महाराज को यह समाचार मिला, उन्होंने कहा — “गड आला, पण सिंह गेला।” इसी वाक्य से किले को ‘सिंहगढ़’ नाम प्राप्त हुआ।
किले पर आज भी तानाजी मालुसरे की समाधि, कोंढणेश्वर मंदिर, मजबूत तटबंदी, दरवाजे और युद्ध स्मारक मौजूद हैं। यह दुर्ग मराठा सैन्य शौर्य और त्याग का जीवंत प्रतीक है।
सिंहगढ़ धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। हर वर्ष शिवजयंती और तानाजी बलिदान दिवस पर हजारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं।
आज सिंहगढ़ किला ट्रेकिंग, मानसून पर्यटन और ऐतिहासिक अध्ययन के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। पुणे से निकट होने के कारण यह महाराष्ट्र का सबसे अधिक देखा जाने वाला दुर्ग है।
सिंहगढ़ वह भूमि है जहाँ स्वराज्य के लिए बलिदान ने अमरता पाई।
सिंहगड किल्ला – पराक्रम आणि बलिदानाची अजरामर गाथा
पुणे जिल्ह्यात सह्याद्री पर्वतरांगेत वसलेला सिंहगड किल्ला मराठा इतिहासातील सर्वात प्रेरणादायी पराक्रमाचा साक्षीदार आहे. १६७० साली याच किल्ल्यासाठी वीर तानाजी मालुसरे यांनी स्वराज्यासाठी आपले प्राण अर्पण केले आणि त्यामुळेच हा दुर्ग ‘सिंहगड’ म्हणून अजरामर झाला.
या किल्ल्याचे जुने नाव कोंढाणा होते. तो मुघलांच्या ताब्यात होता. पुणे परिसरावर नियंत्रण ठेवण्यासाठी हा दुर्ग अत्यंत महत्त्वाचा होता. शिवाजी महाराजांनी तो स्वराज्यात पुन्हा सामील करण्याचे ठरवले आणि ही जबाबदारी तानाजी मालुसरे यांच्यावर सोपवली.
रात्रीच्या अंधारात घोरपडीच्या साहाय्याने तटबंदी चढून मराठा सैनिकांनी किल्ल्यात प्रवेश केला. भीषण युद्ध झाले. तानाजी वीरमरण पावले, पण किल्ला जिंकला गेला. शिवाजी महाराजांनी उद्गार काढले — “गड आला, पण सिंह गेला.” यावरूनच या किल्ल्याला सिंहगड हे नाव मिळाले.
आजही किल्ल्यावर तानाजी मालुसरे यांची समाधी, कोंढणेश्वर मंदिर, बालेकिल्ला, दरवाजे आणि मजबूत तटबंदी पाहायला मिळते.
शिवजयंती आणि तानाजी बलिदान दिनी लाखो शिवभक्त येथे येतात. सिंहगड हा मराठा पराक्रमाचा जिवंत तीर्थ आहे.
आज सिंहगड ट्रेकिंग, पावसाळी पर्यटन आणि ऐतिहासिक अभ्यासासाठी प्रसिद्ध आहे. पुण्याजवळ असल्याने हा सर्वाधिक भेट दिला जाणारा किल्ला आहे.
सिंहगड म्हणजे स्वराज्यासाठी दिलेल्या सर्वोच्च बलिदानाची प्रेरणा.
Sinhagad Fort – The Immortal Sacrifice for Swarajya
Sinhagad Fort, located near Pune in the Sahyadri ranges, is one of the most inspiring monuments of Maratha history. It became immortal in 1670 when the brave warrior Tanaji Malusare sacrificed his life to recapture the fort for Chhatrapati Shivaji Maharaj. Since then, the fort has been known as Sinhagad — the Fort of the Lion.
Originally called Kondhana, the fort was under Mughal control. Its strategic location made it crucial for controlling Pune and surrounding regions. Shivaji Maharaj decided to reclaim it for Swarajya and entrusted the mission to Tanaji Malusare.
In a daring night operation, Maratha soldiers climbed the steep cliffs using a monitor lizard as support and entered the fort. A fierce battle followed in which Tanaji attained martyrdom, but the fort was successfully captured. On hearing the news, Shivaji Maharaj said, “The fort is won, but the lion is lost.” This gave the fort its legendary name.
Today, Tanaji’s memorial, Kondhaneshwar Temple, strong fort walls and gates stand as witnesses to this heroic saga. Sinhagad remains a symbol of bravery and loyalty.
Every year, thousands visit the fort on Shiv Jayanti and Tanaji Balidan Day. It is also a popular trekking and monsoon tourism destination due to its proximity to Pune.
Sinhagad Fort stands as an eternal monument of courage, sacrifice, and the spirit of Swarajya.