चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः |
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ||४-१३||
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ||४-१३||
cāturvarṇyaṃ mayā sṛṣṭaṃ guṇakarmavibhāgaśaḥ .
tasya kartāramapi māṃ viddhyakartāramavyayam ||4-13||
tasya kartāramapi māṃ viddhyakartāramavyayam ||4-13||
।।4.13 -- 4.14।। मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस-(सृष्टि-रचना आदि-) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय रमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता।
