यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः |
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ||५-२८||
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ||५-२८||
yatendriyamanobuddhirmunirmokṣaparāyaṇaḥ .
vigatecchābhayakrodho yaḥ sadā mukta eva saḥ ||5-28||
vigatecchābhayakrodho yaḥ sadā mukta eva saḥ ||5-28||
।।5.27 -- 5.28।। बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।
