नेपाल राजसिंहासन का खूनी राजकीय इतिहास
भाग–1
नेपाल का इतिहास अक्सर हिमालय, बुद्ध और मंदिरों तक सीमित कर दिया जाता है, लेकिन उसके राजसिंहासन का वास्तविक इतिहास उन शांत पहाड़ों के नीचे दबे रक्त, भय और षड्यंत्रों से लिखा गया है। नेपाल का राजकीय इतिहास केवल राजाओं का क्रम नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का दस्तावेज़ है जिसमें सत्ता को ईश्वर का वरदान माना गया और उसके लिए किसी भी सीमा को पार करना उचित समझा गया। यही कारण है कि नेपाल का सिंहासन सदियों तक अपनों के खून से सना रहा।
शाह वंश से पहले नेपाल पर मल्ल राजाओं का शासन था। मल्ल काल को अक्सर कला और वास्तुकला के स्वर्ण युग के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह काल अत्यंत अस्थिर और रक्तरंजित था। मल्ल राजाओं में उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं था। राजा की मृत्यु के बाद राज्य को पुत्रों में बाँट दिया जाता था, जिससे भाई-भाई के शत्रु बन जाते थे। काठमांडू घाटी के तीन प्रमुख राज्य—कांतिपुर, ललितपुर और भक्तपुर—लगातार आपसी युद्धों में उलझे रहते थे। इन युद्धों में केवल सैनिक ही नहीं, बल्कि राजपरिवार के सदस्य भी मारे जाते थे। कई बार छोटे राजकुमारों को इसलिए मार दिया जाता था ताकि भविष्य में वे सत्ता के दावेदार न बन सकें।
यह परंपरा धीरे-धीरे नेपाल की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन गई। सत्ता के लिए हिंसा असामान्य नहीं, बल्कि अपेक्षित मानी जाने लगी। यही विरासत शाह वंश को मिली।
18वीं शताब्दी में गोरखा के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने इस बिखरे हुए नेपाल को एकीकृत करने का अभियान शुरू किया। वह एक कुशल योद्धा, रणनीतिकार और महत्वाकांक्षी शासक थे। उन्होंने छोटे राज्यों को एक-एक कर पराजित किया और आधुनिक नेपाल की नींव रखी। लेकिन पृथ्वी नारायण शाह का ध्यान बाहरी विजय पर अधिक था, आंतरिक राजनीतिक स्थिरता पर कम। उन्होंने शासन को पूर्णतः वंशानुगत और केंद्रीकृत बना दिया, जिसमें राजा सर्वोच्च था और उसकी शक्ति को चुनौती देने की कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं थी।
यही व्यवस्था आगे चलकर घातक सिद्ध हुई।
1775 में पृथ्वी नारायण शाह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र प्रताप सिंह शाह राजा बने। प्रताप सिंह शाह शारीरिक रूप से कमजोर और राजनीतिक रूप से निर्भर शासक थे। वास्तविक सत्ता दरबारियों और रानियों के हाथ में चली गई। यही वह समय था जब राजमहल के भीतर षड्यंत्रों ने स्थायी रूप लेना शुरू किया। प्रताप सिंह शाह की मृत्यु केवल 25 वर्ष की आयु में हो गई। आधिकारिक रूप से इसे बीमारी बताया गया, लेकिन उस समय से ही यह चर्चा चलती रही कि उन्हें धीरे-धीरे ज़हर दिया गया। इसका कारण यह था कि वह सत्ता के विभिन्न गुटों के लिए असुविधाजनक हो चुके थे।
उनकी मृत्यु के बाद उनका पुत्र रणबहादुर शाह राजा बना। वह उस समय नाबालिग था, इसलिए शासन रीजेंसी के माध्यम से चलाया गया। लेकिन रणबहादुर शाह का व्यक्तित्व बचपन से ही अस्थिर था। उन्हें राजसत्ता को ईश्वरीय अधिकार के रूप में सिखाया गया। किसी भी प्रकार का विरोध उनके लिए अपमान था और अपमान का उत्तर हिंसा से दिया जाता था।
जैसे-जैसे रणबहादुर शाह बड़े हुए, उनका शासन भय का प्रतीक बन गया। उन्होंने दरबारियों, रिश्तेदारों और यहां तक कि आम जनता पर भी क्रूर दमन किया। छोटी-सी शंका पर लोगों को यातनाएँ दी जाती थीं। नाक काटना, आँखें निकालना और सार्वजनिक मृत्युदंड आम बात हो गई। यह केवल क्रूरता नहीं थी, बल्कि सत्ता बनाए रखने की रणनीति थी—डर के माध्यम से नियंत्रण।
रणबहादुर शाह का निजी जीवन भी उतना ही अव्यवस्थित था। उन्होंने कई विवाह किए, जिससे दरबार में रानियों के गुट बन गए। हर रानी अपने पुत्र को उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी। इससे राजमहल एक राजनीतिक युद्धभूमि में बदल गया। रणबहादुर शाह स्वयं भी किसी पर भरोसा नहीं करते थे। उन्हें हर व्यक्ति संभावित शत्रु लगता था।
अंततः 1799 में उन्होंने अपने ही पुत्र गिर्वाण युद्ध विक्रम शाह को राजा घोषित कर दिया, लेकिन यह सत्ता त्याग नहीं था। वह स्वयं पर्दे के पीछे से शासन करना चाहते थे। यह स्थिति अस्थिर थी। दरबार दो हिस्सों में बंट गया—एक गिर्वाण समर्थक और दूसरा रणबहादुर समर्थक।
1806 में यह संघर्ष अपने चरम पर पहुँचा। एक सार्वजनिक दरबार के दौरान रणबहादुर शाह और उनके सौतेले भाई शेर बहादुर शाह के बीच तीखा विवाद हुआ। उसी क्षण शेर बहादुर शाह ने तलवार निकालकर रणबहादुर शाह की हत्या कर दी। यह हत्या केवल व्यक्तिगत क्रोध नहीं थी, बल्कि वर्षों के अत्याचार का विस्फोट थी।
रणबहादुर शाह की हत्या के बाद नेपाल में जो हुआ, वह केवल बदला नहीं था, बल्कि सत्ता का सुनियोजित सफाया था। भीमसेन थापा, जो रणबहादुर के विश्वासपात्र थे, ने भंडारखाल में एक ही रात में दर्जनों राजकुमारों, दरबारियों और संभावित उत्तराधिकारियों को मरवा दिया। यह सुनिश्चित किया गया कि शाह वंश में कोई भी ऐसा व्यक्ति जीवित न बचे जो सत्ता को चुनौती दे सके।
इस नरसंहार ने नेपाल के राजपरिवार की आत्मा को तोड़ दिया। अब राजा केवल नाम के रह गए। भय, अविश्वास और हिंसा ही शासन की भाषा बन गई। यही वह वातावरण था जिसने आगे चलकर राणा शासन के लिए रास्ता तैयार किया।
19वीं शताब्दी के मध्य में कोत पर्व के माध्यम से जंग बहादुर राणा ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया। इस घटना में भी रक्तपात हुआ, लेकिन यह केवल शुरुआत थी। राणा शासन ने शाह राजाओं को जीवित रखा, लेकिन उन्हें मानसिक कैद में डाल दिया। वे राजा थे, लेकिन निर्णय नहीं ले सकते थे। यह सत्ता की एक नई प्रकार की हत्या थी—धीमी, मौन और पीढ़ियों तक चलने वाली।
यहीं भाग-1 समाप्त होता है।
यह वह बिंदु है जहाँ से नेपाल का राजसिंहासन प्रत्यक्ष हत्याओं से आगे बढ़कर संरचनात्मक और मानसिक हिंसा का उपकरण बन जाता है।
भाग–2
राणा शासन के आरंभ के साथ ही नेपाल के सिंहासन की प्रकृति बदल गई, लेकिन उसका रक्तरंजित चरित्र समाप्त नहीं हुआ। अब हत्या हमेशा तलवार या गोली से नहीं होती थी; कई बार वह धीरे-धीरे, योजनाबद्ध तरीके से, भय, कैद और मानसिक दमन के रूप में की जाती थी। जंग बहादुर राणा और उसके उत्तराधिकारियों ने शाह राजाओं को जीवित रखा, परंतु उनकी राजनीतिक चेतना, स्वतंत्रता और भविष्य की संभावनाओं को लगभग समाप्त कर दिया। यह एक प्रकार की “राजकीय जीवित हत्या” थी, जिसमें व्यक्ति सांस लेता रहता है, पर निर्णय करने की शक्ति से वंचित रहता है।
राणा काल में शाह राजपरिवार के सदस्यों की कई संदिग्ध मौतें दर्ज की जाती हैं, जिन्हें आधिकारिक इतिहास में बहुत हल्के ढंग से लिया गया। कुछ राजकुमार कम उम्र में बीमार पड़कर मर गए, कुछ कथित दुर्घटनाओं का शिकार हुए, और कुछ के बारे में केवल इतना कहा गया कि वे “अस्वस्थ” थे। उस समय न स्वतंत्र प्रेस थी, न निष्पक्ष चिकित्सा जांच। राणा शासकों के लिए सबसे बड़ा खतरा वही शाह सदस्य था जो राजनीतिक रूप से सजग, लोकप्रिय या स्वतंत्र सोच वाला हो सकता था।
राजा त्रिभुवन स्वयं इस भय के प्रतीक थे। उन्हें कई बार नजरबंद किया गया, उनके पत्रों की जाँच होती थी, उनके मिलने-जुलने पर प्रतिबंध था। उनके परिवार के सदस्यों पर भी लगातार निगरानी रखी जाती थी। यह केवल सत्ता नियंत्रण नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि शाह वंश कभी फिर से वास्तविक शक्ति न प्राप्त कर सके। त्रिभुवन का भारत पलायन इस मानसिक कैद का प्रत्यक्ष प्रमाण था।
1951 में राणा शासन के पतन और राजशाही की पुनर्स्थापना ने जनता में यह आशा जगाई कि अब सिंहासन से हिंसा और षड्यंत्र का युग समाप्त होगा। लेकिन इतिहास इतनी आसानी से दिशा नहीं बदलता। राणा शासन ने जो संस्थागत भय और अविश्वास पैदा किया था, वह राजमहल की दीवारों में समा चुका था।
राजा महेंद्र के शासनकाल में सत्ता फिर से केंद्रित हुई। उन्होंने लोकतांत्रिक प्रयोग को समाप्त कर पंचायती व्यवस्था लागू की। यद्यपि यह प्रत्यक्ष रूप से राजपरिवार के भीतर हत्याओं का काल नहीं था, लेकिन सत्ता के लिए कठोरता और नियंत्रण की वही मानसिकता बनी रही। राजनीतिक विरोधियों की संदिग्ध मौतें, रहस्यमय गिरफ्तारियाँ और दमन इस काल की विशेषता थीं। राजा महेंद्र की 1972 में हुई अचानक मृत्यु को आधिकारिक रूप से दिल का दौरा बताया गया, लेकिन नेपाल के राजनीतिक और पत्रकारिता जगत में आज भी यह प्रश्न उठता है कि क्या यह पूरी तरह प्राकृतिक थी। कोई स्वतंत्र चिकित्सा रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई, और यह मृत्यु सत्ता हस्तांतरण के एक संवेदनशील मोड़ पर हुई।
राजा वीरेन्द्र का काल अपेक्षाकृत उदार माना जाता है। उन्होंने संवैधानिक राजशाही को स्वीकार किया और जनता के प्रति नरम रुख अपनाया। लेकिन राजमहल के भीतर तनाव कम नहीं हुआ। शाही परिवार एक ऐसे संस्थान में बदल चुका था, जहाँ भावनाएँ, इच्छाएँ और व्यक्तिगत स्वतंत्रता लगातार सत्ता और परंपरा से टकराती थीं।
अब उन संदिग्ध मौतों और घटनाओं की विस्तृत सूची को समझना आवश्यक है, जो 2001 की त्रासदी से पहले और उसके आसपास घटित हुईं, और जिन्होंने शाही परिवार के भीतर असुरक्षा और अविश्वास को और गहरा किया।
प्रताप सिंह शाह की असमय मृत्यु, जिसे बीमारी बताया गया, पर ज़हर की आशंका कभी समाप्त नहीं हुई।
गिर्वाण युद्ध विक्रम शाह की बाल्यावस्था में मृत्यु, जो सत्ता संघर्ष के काल में हुई।
रणबहादुर शाह की पत्नी और कुछ संतानों की अस्पष्ट चिकित्सकीय मौतें।
भंडारखाल हत्याकांड में मारे गए कई राजकुमार, जिनका अपराध केवल “संभावित उत्तराधिकारी” होना था।
राणा काल में कई शाह युवराजों की अचानक बीमारी या दुर्घटना।
राजा महेंद्र की अप्रत्याशित मृत्यु।
राजा वीरेन्द्र के रिश्तेदारों की कुछ सड़क और हवाई दुर्घटनाएँ, जिनकी स्वतंत्र जांच कभी नहीं हुई।
और अंततः 1 जून 2001 की वह रात, जब लगभग पूरा शाही परिवार एक ही स्थान पर, एक ही समय में समाप्त हो गया।
2001 का नारायणहिटी राजदरबार हत्याकांड केवल नेपाल ही नहीं, बल्कि विश्व इतिहास की सबसे रहस्यमय शाही हत्याओं में से एक है। आधिकारिक कथा के अनुसार युवराज दीपेंद्र ने शराब और नशीले पदार्थों के प्रभाव में आकर अपने ही परिवार पर स्वचालित हथियारों से गोलीबारी की। लेकिन इस कथा में इतने छेद हैं कि यह केवल एक “सरल सत्य” नहीं लगती, बल्कि एक अधूरी कहानी प्रतीत होती है।
फॉरेंसिक दृष्टि से देखें तो सबसे पहला प्रश्न हथियारों से जुड़ा है। कहा गया कि दीपेंद्र ने कई प्रकार के हथियारों का प्रयोग किया—एम-16, एमपी5 और एक पिस्तौल। इतने कम समय में इतने हथियार बदलना, वह भी भारी गोलीबारी के बीच, अत्यंत असामान्य है। इसके अलावा, गोलीबारी के दौरान किसी सुरक्षा गार्ड द्वारा तुरंत प्रतिक्रिया न होना भी संदेहास्पद है। शाही महल की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर नहीं मानी जाती थी।
घटनास्थल के साक्ष्यों को पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया। गोलियों के खोखे, फायरिंग एंगल, घावों की प्रकृति—इन सबकी विस्तृत रिपोर्ट जनता के सामने नहीं आई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी पूर्ण रूप से जारी नहीं की गई। यह किसी भी आधुनिक आपराधिक जांच के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।
सबसे अधिक प्रश्न युवराज दीपेंद्र की स्थिति को लेकर उठते हैं। आधिकारिक बयान के अनुसार उन्होंने स्वयं को गोली मार ली और कोमा में चले गए। लेकिन इसके बावजूद उन्हें संवैधानिक रूप से राजा घोषित किया गया। यह निर्णय न केवल नैतिक रूप से, बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी विवादास्पद था। तीन दिनों तक कोमा में रहते हुए उनसे कोई बयान नहीं लिया गया, कोई स्वतंत्र चिकित्सकीय प्रेस ब्रीफिंग नहीं हुई।
राजनीतिक विश्लेषण इस घटना को और जटिल बना देता है। इस हत्याकांड के बाद सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदल गया। ज्ञानेंद्र शाह राजा बने, जो घटना के समय महल में उपस्थित नहीं थे। यही तथ्य उन्हें संदेह के घेरे में ले आया। यद्यपि उनके विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिले, लेकिन जनता के मन में यह प्रश्न बना रहा कि इतनी बड़ी घटना के समय उनका अनुपस्थित होना केवल संयोग था या रणनीति।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी यह घटना महत्वपूर्ण थी। नेपाल उस समय आंतरिक माओवादी विद्रोह, राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी दबावों से जूझ रहा था। शाही परिवार का लगभग पूर्ण अंत इन सभी शक्तियों के लिए समीकरण बदलने वाला था। जांच आयोग की सीमित अवधि, सीमित अधिकार और गोपनीय रिपोर्ट ने संदेह को और गहरा किया।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से दीपेंद्र का चरित्र भी सरल नहीं था। वह एक ऐसे वातावरण में पले-बढ़े थे जहाँ उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे राजा बनेंगे, लेकिन इंसान के रूप में उनकी इच्छाओं, प्रेम और स्वतंत्रता को महत्व नहीं दिया गया। विवाह को लेकर तनाव केवल एक कारण हो सकता है, पूरा कारण नहीं। दशकों का पारिवारिक दबाव, सत्ता की छाया और भावनात्मक अलगाव किसी भी व्यक्ति को तोड़ सकता है।
2001 के बाद नेपाल में राजशाही की नैतिक वैधता समाप्त हो चुकी थी। जनता ने पहली बार स्पष्ट रूप से यह महसूस किया कि सिंहासन न तो स्थिरता दे सकता है, न सुरक्षा। 2006 का जन आंदोलन केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि उस ऐतिहासिक हिंसा और भय के विरुद्ध विद्रोह था जो सदियों से राजमहल के भीतर पल रहा था।
2008 में नेपाल को गणराज्य घोषित किया गया। जिस सिंहासन के लिए पीढ़ियों तक खून बहाया गया, वह बिना किसी युद्ध के समाप्त हो गया। यह इतिहास का सबसे बड़ा व्यंग्य था। सत्ता के लिए अपनों को मारने वाला राजवंश अंततः जनता के निर्णय के आगे नतमस्तक हो गया।
नेपाल के सिंहासन का यह खूनी इतिहास केवल अतीत की कहानी नहीं है। यह सत्ता के मनोविज्ञान की चेतावनी है। यह दिखाता है कि जब सत्ता पारिवारिक, वंशानुगत और जवाबदेही से मुक्त होती है, तब वह धीरे-धीरे अपने ही रक्त से स्वयं को नष्ट कर लेती है। शाह वंश का अंत किसी एक रात की घटना नहीं था, बल्कि सदियों तक चले भय, हिंसा और अविश्वास का स्वाभाविक परिणाम था।
नेपाल का राजसिंहासन आज इतिहास बन चुका है, लेकिन उसके पीछे बहा खून आज भी उन पत्थरों, उन दीवारों और उन कहानियों में जीवित है। यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि कोई भी सत्ता, चाहे वह कितनी ही पवित्र क्यों न प्रतीत हो, यदि वह मानवता से ऊपर रखी जाए, तो अंततः स्वयं अपने भार से ढह जाती है।
नेपाल के सिंहासन के खूनी इतिहास से जुड़ी प्रमुख तिथियाँ
• 1200–1768 – मल्ल वंश का शासन, काठमांडू घाटी में लगातार आंतरिक युद्ध, भाई-भाई के बीच सत्ता संघर्ष और राजकुमारों की हत्याएँ
• 25 सितंबर 1723 – पृथ्वी नारायण शाह का जन्म
• 1768–1769 – पृथ्वी नारायण शाह द्वारा काठमांडू घाटी पर विजय, आधुनिक नेपाल की स्थापना
• 11 जनवरी 1775 – पृथ्वी नारायण शाह की मृत्यु
• 1775–1777 – प्रताप सिंह शाह का शासन
• 1777 (लगभग) – प्रताप सिंह शाह की संदिग्ध मृत्यु (ज़हर की आशंका)
• 1777 – रणबहादुर शाह का राज्याभिषेक (नाबालिग अवस्था)
• 1799 – रणबहादुर शाह द्वारा अपने पुत्र गिर्वाण युद्ध विक्रम शाह को राजा घोषित करना
• 25 अप्रैल 1806 – रणबहादुर शाह की खुले दरबार में हत्या
• अप्रैल 1806 – भंडारखाल हत्याकांड, लगभग 40 से अधिक राजपरिवार व दरबारी सदस्यों की हत्या
• 1806–1837 – भीमसेन थापा का वास्तविक सत्ता नियंत्रण
• 14 सितंबर 1846 – कोत पर्व (Kot Massacre), जंग बहादुर राणा द्वारा सामूहिक हत्या
• 1846–1951 – राणा वंश का तानाशाही शासन, शाह राजा नाममात्र
• 23 जून 1911 – राजा त्रिभुवन का जन्म
• 1950 – राजा त्रिभुवन का भारत पलायन (राणा शासन से बचने हेतु)
• 18 फरवरी 1951 – राणा शासन का अंत, राजशाही की पुनर्स्थापना
• 11 जनवरी 1920 – राजा महेंद्र का जन्म
• 31 जनवरी 1972 – राजा महेंद्र की संदिग्ध/अचानक मृत्यु
• 28 दिसंबर 1945 – राजा वीरेन्द्र का जन्म
• 1972–2001 – राजा वीरेन्द्र का शासनकाल
• 1 जून 2001 – नारायणहिटी राजदरबार हत्याकांड
(राजा वीरेन्द्र, रानी ऐश्वर्य सहित 9 शाही सदस्यों की हत्या)
• 4 जून 2001 – युवराज दीपेंद्र की मृत्यु
• 4 जून 2001 – ज्ञानेंद्र शाह का राज्याभिषेक
• 1 फरवरी 2005 – ज्ञानेंद्र शाह द्वारा सत्ता अपने हाथ में लेना
• अप्रैल 2006 – जन आंदोलन (Jana Andolan II), राजशाही के खिलाफ़ विद्रोह
• 28 मई 2008 – नेपाल आधिकारिक रूप से गणराज्य घोषित, 240 वर्षों की राजशाही समाप्त


