अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः |
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ||३-१४||
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ||३-१४||
annādbhavanti bhūtāni parjanyādannasambhavaḥ .
yajñādbhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ ||3-14||
yajñādbhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ ||3-14||
।।3.14 -- 3.15।। सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है।
