आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः |
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ||१-३४||
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ||१-३४||
ācāryāḥ pitaraḥ putrāstathaiva ca pitāmahāḥ .
mātulāḥ śvaśurāḥ pautrāḥ śyālāḥ sambandhinastathā ||1-34||
mātulāḥ śvaśurāḥ pautrāḥ śyālāḥ sambandhinastathā ||1-34||
।।1.34 -- 1.35।। (टिप्पणी प0 24.1) आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझ पर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या?
