कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् |
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ||१-३९||
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ||१-३९||
kathaṃ na jñeyamasmābhiḥ pāpādasmānnivartitum .
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ prapaśyadbhirjanārdana ||1-39||
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ prapaśyadbhirjanārdana ||1-39||
।।1.38 -- 1.39।। यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होनेका विचार क्यों न करें?
