तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् |
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ||११-४४||
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् |
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ||११-४४||
tasmātpraṇamya praṇidhāya kāyaṃ prasādaye tvāmahamīśamīḍyam .
piteva putrasya sakheva sakhyuḥ priyaḥ priyāyārhasi deva soḍhum ||11-44||
piteva putrasya sakheva sakhyuḥ priyaḥ priyāyārhasi deva soḍhum ||11-44||
।।11.44।। इसलिये शरीरसे लम्बा पड़कर स्तुति करनेयोग्य आप ईश्वरको मैं प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ। जैसे पिता पुत्रके, मित्र मित्रके और पति पत्नीके अपमानको सह लेता है, ऐसे ही हे देव ! आप मेरे द्वारा किया गया अपमान सहनेमें समर्थ हैं।
