प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते |
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ||२-६५||
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ||२-६५||
prasāde sarvaduḥkhānāṃ hānirasyopajāyate .
prasannacetaso hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate ||2-65||
prasannacetaso hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate ||2-65||
।।2.64 -- 2.65।। वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है।
