राजमाता जिजाऊ भोसले: राष्ट्र निर्माण की अद्वितीय शिल्पी और हिंदवी स्वराज्य की जननी
विशेष ऐतिहासिक एवं शोधपरक आलेख | भारतीय सांस्कृतिक विरासत
भारतीय इतिहास का कालखंड अनेक शूरवीरों, सम्राटों और विचारकों की गाथाओं से समृद्ध है। किंतु कुछ विभूतियाँ ऐसी होती हैं, जिनका पराक्रम केवल युद्धभूमि की सीमाओं तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे अपने उच्च संस्कारों, दूरदर्शी रणनीतियों और अडिग नैतिक मूल्यों से एक संपूर्ण राष्ट्र का चरित्र निर्मित करती हैं। मध्यकालीन भारत के इतिहास में ऐसा ही एक दैदीप्यमान और युगप्रवर्तक नाम है – राजमाता जिजाऊ (जिजाबाई शहाजी भोसले)।
राजमाता जिजाऊ केवल छत्रपती शिवाजी महाराज की माता नहीं थीं, अपितु वे ‘हिंदवी स्वराज्य’ (स्वदेशी न्यायपूर्ण शासन) की मूल संकल्पना की जननी, मराठा अस्मिता की वैचारिक मार्गदर्शक और भारतीय इतिहास में नारी शक्ति व कूटनीति की सर्वोच्च प्रतीक थीं। विदेशी आक्रांताओं के दमन चक्र के बीच उन्होंने एक ऐसे साम्राज्य की नींव रखी, जिसने आगे चलकर मुगलों के वर्चस्व को समाप्त कर दिया।
१६वीं-१७वीं शताब्दी की राजनैतिक पृष्ठभूमि और चुनौतियाँ
जिस कालखंड में जिजाऊ का जन्म और विकास हुआ, वह भारत और विशेषकर दक्खन (महाराष्ट्र) के इतिहास का अत्यंत अंधकारमय और अराजक युग था। संपूर्ण क्षेत्र दिल्ली के मुगल साम्राज्य, बीजापुर की आदिलशाही और अहमदनगर की निजामशाही जैसी आक्रांता शक्तियों के बीच बंटा हुआ था। इन सुल्तानों के आपसी संघर्षों की बलि स्थानीय जनता चढ़ती थी।
उस समय की कटु वास्तविकताओं में धार्मिक उत्पीड़न, मंदिरों का विध्वंस, किसानों का अत्यधिक आर्थिक शोषण और महिलाओं का अनादर आम बात थी। स्थानीय मराठा सरदार इन सुल्तानों के अधीन जागीरदारी और चाकरी करने में ही अपनी प्रतिष्ठा समझते थे। इस आत्मग्लानि और पराधीनता के माहौल में एक स्वाभिमानी, स्वतंत्र और लोक-कल्याणकारी राज्य की कल्पना करना भी आत्मघाती माना जाता था। इसी विपरीत परिस्थिति में जिजाऊ ने न केवल स्वराज्य का स्वप्न देखा, बल्कि उसे साकार करने के लिए आवश्यक जनशक्ति और वैचारिक चेतना को भी जागृत किया।
ऐतिहासिक तिथियाँ एवं जीवनवृत्त सारणी
| घटना / संदर्भ | ऐतिहासिक तिथि / काल | स्थान एवं महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
| जन्म | १२ जनवरी १५९८ | सिंदखेड राजा (वर्तमान बुलढाणा जिला, महाराष्ट्र) |
| वंश एवं माता-पिता | यादव वंशज | पिता: राष्ट्रवीर लखुजीराव जाधव | माता: महालसाबाई (गिरिजाबाई) |
| विवाह | दिसंबर इ.स. १६०५ (अंदाजे) | शहाजीराजे भोसले के साथ (दौलताबाद में संपन्न) |
| शिवराज्याभिषेक | ६ जून १६७४ | रायगढ़ किला (जिजाऊ के जीवन का सर्वोच्च स्वप्न साकार) |
| महानिर्वाण (मृत्यु) | १७ जून १६७४ | पाचाड़ (रायगढ़ किले की तलहटी), विवाह के ६९ वर्ष बाद |
जन्म, उच्च वंश और शौर्य के संस्कार
जिजाबाई का जन्म १२ जनवरी १५९८ को सिंदखेड राजा के वैभवशाली जाधवराव परिवार में हुआ था। उनके पिता, लखुजीराव जाधव, देवगिरि के प्रसिद्ध यादव राजवंश के वंशज थे और निजामशाही के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली सेनापतियों में गिने जाते थे। उनकी माता महालसाबाई एक अत्यंत दृढ़-निश्चयी, धार्मिक और स्वाभिमानी महिला थीं।
जिजाऊ को बचपन से ही लड़कों के समान घुड़सवारी, तलवारबाजी, तीरंदाजी और युद्ध-कौशल की शिक्षा दी गई थी। इसके साथ ही, उन्हें राजनीति, न्यायशास्त्र and कूटनीति का भी गहरा ज्ञान मिला। उनके बालमन पर अपनी माता द्वारा सुनाए गए रामायण, महाभारत और पुराणों के प्रसंगों का गहरा प्रभाव पड़ा, जिसने उनमें स्वधर्म और स्वाभिमान की भावना को कूट-कूट कर भर दिया।
शहाजीराजे भोसले से विवाह और संघर्षमय जीवन
मात्र सात वर्ष की आयु में, दिसंबर १६०५ में, जिजाऊ का विवाह वेरुळ (एलोरा) के पराक्रमी सरदार मालोजीराजे भोसले के सुपुत्र शहाजीराजे भोसले से हुआ। शहाजीराजे तत्कालीन भारत के एक असाधारण योद्धा, कूटनीतिज्ञ और दूरदर्शी सेनानी थे, जिन्होंने अपनी सैन्य शक्ति के बल पर निजामशाही और आदिलशाही रियासतों को कई बार मुगलों के आक्रमणों से बचाया था।
शहाजीराजे का अधिकांश जीवन युद्धक्षेत्रों, सैनिक अभियानों और राजनीतिक दांव-पेंचों में व्यतीत हुआ। इस कारण परिवार के भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा और जागीर के प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी अकेले जिजाऊ के कंधों पर आ गई। इस दौरान जाधव और भोसले परिवारों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण उनके पिता और पति के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए, किंतु जिजाऊ ने अत्यंत संतुलन और धैर्य के साथ भोसले कुल की गरिमा को सर्वोपरि रखा।
“जब उनके पिता लखुजीराव जाधव और भाइयों की निजामशाही दरबार में विश्वासघात से हत्या कर दी गई, तब जिजाऊ टूटी नहीं, बल्कि उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे विदेशी सुल्तानों की इस क्रूर व्यवस्था को समूल नष्ट करने वाली संतान को जन्म देंगी।”
छत्रपती शिवाजी महाराज का जन्म और संस्कारशाला
१९ फरवरी १६३० को जुन्नर के समीप स्थित अभेद्य शिवनेरी किले पर जिजाऊ ने अपने अद्वितीय पुत्र ‘शिवाजी’ को जन्म दिया। शिवाजी के जन्म से पूर्व ही जिजाऊ ने शिवनेरी पर स्थित जगदम्बा स्वरूपा ‘शिवाई देवी’ से एक ऐसे पुत्र की मन्नत मांगी थी जो परकीय दासता से जनता को मुक्त करा सके।
शिवाजी महाराज के बाल्यकाल में जब शहाजीराजे कर्नाटक के अभियानों में व्यस्त थे, तब इ.स. १६३६ से जिजाऊ ने पुणे की जागीर का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया। उजाड़ हो चुके पुणे को उन्होंने दोबारा बसाया। उन्होंने शिवाजी महाराज को केवल शस्त्र चलाना ही नहीं सिखाया, बल्कि न्यायप्रियता, सर्वधर्म-समभाव, महिलाओं के प्रति अगाध सम्मान और कूटनीतिक चातुर्य के संस्कार दिए। वे बालक शिवबा को अक्सर प्रेरित करती थीं:
“हे शिवबा! दूसरों की चाकरी (गुलामी) में कोई प्रतिष्ठा नहीं है। ईश्वर ने तुम्हें इस भूमि पर अन्याय का विनाश करने और पीड़ित प्रजा के कल्याण के लिए भेजा है। स्वराज्य ही तुम्हारा एकमात्र ध्येय होना चाहिए।”
प्रशासक और न्यायकर्ता के रूप में भूमिका
जिजाऊ केवल एक आदर्श माता ही नहीं, बल्कि एक अत्यंत कुशल और कड़क प्रशासक (Regent) भी थीं। जब शिवाजी महाराज युद्ध अभियानों पर जाते थे, तब स्वराज्य के शासन की पूरी बागडोर जिजाऊ ही संभालती थीं।
- पुणे का पुनरुद्धार: बीजापुर के सेनापति मुराद खान द्वारा पुणे पर गधे का हल चलवाकर उसे शापित कर दिया गया था। जिजाऊ ने सोने का हल चलवाकर उस अंधविश्वास को तोड़ा और कृषि को पुनर्जीवित किया।
- त्वरित न्याय प्रणाली: वे स्वयं अपनी अदालत (मजलीस) लगाती थीं और जागीर के विवादों, भूमि संबंधी झगड़ों और अपराधियों को कड़ा दंड देने का कार्य करती थीं। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने वाले अपराधियों को वे कठोरतम सजा देती थीं, चाहे वह कितना ही बड़ा रसूखदार क्यों न हो।
- सामरिक मार्गदर्शक: इ.स. १६५९ में जब अफजल खान विशाल सेना लेकर शिवाजी महाराज को मारने आया, या इ.स. १६६६ में जब शिवाजी महाराज आगरा की जेल में नजरबंद थे, तब संकट के उन क्षणों में जिजाऊ ने असीम धैर्य दिखाते हुए स्वराज्य को बिखरने से बचाया और प्रशासन को सुचारू रूप से चलाया।
ऐतिहासिक तथ्य: आगरा नजरबंदी का संकट (१६६६)
जब छत्रपती शिवाजी महाराज और उनके पुत्र संभाजी महाराज को मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने आगरा में बंदी बना लिया था, तब स्वराज्य के पतन का खतरा मंडरा रहा रहा था। उस ३६ वर्षीय शिवाजी की अनुपस्थिति में ६८ वर्षीय वयोवृद्ध राजमाता जिजाऊ ने सेनापतियों का हौसला बढ़ाया और कूटनीतिक मोर्चों को संभाला, जिससे स्वराज्य सुरक्षित रहा।
स्वप्नपूर्ति: शिवराज्याभिषेक और महानिर्वाण
जिजाऊ का संपूर्ण जीवन संघर्ष, त्याग और तपस्या की पराकाष्ठा था। उनके ज्येष्ठ पुत्र संभाजी (शहाजीराजे के बड़े बेटे) कनकगिरि के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए और इ.स. १६६४ में उनके पति शहाजीराजे का भी शिकार के दौरान दुर्घटना में निधन हो गया। इन तमाम व्यक्तिगत दुखों को किनारे रखकर वे केवल अपने राष्ट्र-कार्य में जुटी रहीं।
उनका अंतिम और सर्वोच्च जीवन-लक्ष्य शिवाजी महाराज को एक संप्रभु, स्वतंत्र हिंदू राजा के रूप में स्थापित देखना था। वह ऐतिहासिक क्षण ६ जून १६७४ को आया, जब रायगढ़ किले पर गागाभट्ट के आचार्यत्व में छत्रपती शिवाजी महाराज का विधिवत राज्याभिषेक हुआ और वे ‘हिंदवी स्वराज्य के छत्रपती’ बने। जिजाऊ इस गौरवमयी क्षण की साक्षी बनीं; उनके जीवन का स्वप्न शत-प्रतिशत पूर्ण हो चुका था。
राज्याभिषेक के मात्र १२ दिन पश्चात, १७ जून १६७४ को, रायगढ़ की तलहटी में स्थित पाचाड़ गांव में इस महान विभूति ने ७६ वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। इतिहासकार मानते हैं कि उन्होंने अपनी देह तब त्यागी, जब उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि उनका लगाया हुआ स्वराज्य का पौधा अब एक वटवृक्ष बन चुका है जो आंधी-तूफानों का सामना करने में सक्षम है।
निष्कर्ष एवं आज के युग में प्रासंगिकता
राजमाता जिजाऊ भोसले केवल इतिहास का एक पन्ना नहीं, बल्कि वह ज्वलंत वैचारिक मशाल हैं जिसकी आज के भारत को सर्वाधिक आवश्यकता है। संस्कारयुक्त शिक्षा, मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम, महिला सशक्तिकरण और नैतिक नेतृत्व का जो पाठ उन्होंने ४०० वर्ष पूर्व सिखाया, वह आज भी शाश्वत है। राष्ट्र निर्माण की इस आद्य शिल्पी को कोटि-कोटि नमन।


