बाजीराव पेशवा (Bajirao Peshwa) भारतीय इतिहास के उन चुनिंदा योद्धाओं में से एक हैं, जिन्होंने अपने जीवन में एक भी युद्ध नहीं हारा। उन्होंने मराठा साम्राज्य को “हिंदवी स्वराज्य” के रूप में पूरे भारत में फैलाया और मुगलों की जड़ें हिला दीं। आइए जानते हैं इस अपराजित योद्धा की गौरवगाथा।
1. 18वीं सदी का भारत: मुगलों का पतन और मराठों का उदय
18वीं सदी की शुरुआत में मुग़ल साम्राज्य अपने पतन की ओर था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद दिल्ली की सत्ता कमजोर पड़ चुकी थी। यह वह समय था जब मराठों ने महाराष्ट्र से निकलकर पूरे भारत में अपने साम्राज्य विस्तार का सपना देखा। इस सपने को हकीकत में बदलने का श्रेय बाजीराव प्रथम को जाता है।
2. जन्म और प्रारंभिक जीवन: युद्धभूमि में पला एक योद्धा
बाजीराव का जन्म 18 अगस्त 1700 को एक चित्पावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता बालाजी विश्वनाथ छत्रपति शाहू महाराज के प्रथम पेशवा (प्रधानमंत्री) थे। बचपन से ही बाजीराव ने तलवारबाजी, घुड़सवारी और सैन्य रणनीतियों में निपुणता हासिल कर ली थी। वे राजमहलों की बजाय सैन्य शिविरों में बड़े हुए।
3. 20 वर्ष की आयु में पेशवाई: “तने पर वार करो…”
1720 में पिता की मृत्यु के बाद, मात्र 20 वर्ष की आयु में छत्रपति शाहू महाराज ने बाजीराव को नया पेशवा नियुक्त किया। कई वरिष्ठ दरबारियों ने उनकी कम उम्र का विरोध किया, लेकिन बाजीराव ने अपनी दूरदर्शिता से सबको चकित कर दिया। मुगलों की कमजोरी को भांपते हुए उन्होंने दरबार में एक ऐतिहासिक बात कही थी:
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हमें इस जर्जर पेड़ के तने पर वार करना चाहिए, शाखाएं तो खुद-ब-खुद गिर जाएंगी। हमारी पताका कृष्णा नदी से लेकर अटक (सिंधु) तक फहरेगी।
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4. सैन्य प्रतिभा और युद्ध नीति: बाजीराव की ‘लाइटनिंग कैवेलरी’
बाजीराव विश्व सैन्य इतिहास के महानतम रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। उनकी युद्ध शैली (The Military Genius) बेजोड़ थी।
- ➤ गति ही हथियार है (Speed as a Weapon): बाजीराव ने भारी तोपखाने पर निर्भर रहने के बजाय तेज चलने वाली घुड़सवार सेना का उपयोग किया। उनकी सेना दुश्मन से कई गुना तेजी से यात्रा करती थी।
- ➤ गुरिल्ला युद्ध (Guerrilla Warfare 2.0): दुश्मन की रसद काटना और अचानक हमला करके उन्हें चौंका देना उनकी प्रमुख नीति थी।
5. पालखेड का युद्ध (1728): सैन्य रणनीति का मास्टरक्लास
पृष्ठभूमि और रणनीति
दक्कन में निज़ाम-उल-मुल्क मराठों का सबसे बड़ा दुश्मन था। 1728 में बाजीराव ने उसे पालखेड के युद्ध में चकमा दिया। बाजीराव की तेज तर्रार घुड़सवार सेना ने निज़ाम की भारी-भरकम सेना को बिना लड़े ही पानी और रसद के लिए तरसा दिया।
निज़ाम का आत्मसमर्पण
अंततः निज़ाम को हार माननी पड़ी और ‘मुंगी-शिवगाँव की संधि’ पर हस्ताक्षर करने पड़े। यह युद्ध बाजीराव की ‘गतिशीलता की रणनीति’ (Mobility strategy) का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है।
6. मालवा, गुजरात और बुंदेलखंड: साम्राज्य का महा-विस्तार
पेशवा बनने के बाद बाजीराव ने उत्तर भारत की ओर कूच किया:
- मालवा और गुजरात पर नियंत्रण: मुगलों को हराकर इन समृद्ध प्रांतों पर मराठों का अधिकार स्थापित किया।
- बुंदेलखंड और महाराजा छत्रसाल की रक्षा (1729): जब मुग़ल सेनापति मुहम्मद खान बंगश ने बुंदेलखंड पर हमला किया, तब महाराजा छत्रसाल की पुकार पर बाजीराव ने बिजली की गति से पहुँचकर मुगलों को हराया। इसी कृतज्ञता स्वरूप उन्हें मस्तानी (छत्रसाल की पुत्री) पत्नी के रूप में मिलीं।
7. दिल्ली पर ऐतिहासिक आक्रमण (1737): मुगलों के दिल में खौफ
मुगलों को अपनी ताकत का एहसास दिलाने के लिए बाजीराव ने 1737 में केवल 500 चुनिंदा घुड़सवारों के साथ सीधे मुग़ल राजधानी दिल्ली पर धावा बोल दिया।
दिल्ली में दहशत (Panic in Delhi): मराठों को दिल्ली के लाल किले के इतने करीब देखकर मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला खौफ में आ गया और लाल किला छोड़कर भागने की तैयारी करने लगा। बाजीराव ने दिल्ली को लूटा नहीं, बल्कि अपना खौफ दिखाकर वापस पुणे लौट आए।
8. भोपाल का युद्ध (1737-38): निज़ाम की अंतिम हार
दिल्ली के अपमान का बदला लेने के लिए मुगलों और निज़ाम ने मिलकर बाजीराव को घेरने की कोशिश की, लेकिन भोपाल के युद्ध में बाजीराव ने एक बार फिर निज़ाम को बुरी तरह पराजित किया। इस जीत ने मालवा पर मराठों के पूर्ण अधिकार को मुहर लगा दी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q. बाजीराव की युद्ध रणनीति (Lightning Cavalry) क्या थी?
उत्तर: तेज गति वाली घुड़सवार सेना जो दुश्मन की रसद काटती थी और अचानक हमला कर चौंका देती थी।
Q. मस्तानी कौन थी?
उत्तर: मस्तानी बुंदेलखंड के राजपूत राजा छत्रसाल की पुत्री थीं। बुंदेलखंड को मुगलों से बचाने पर राजा छत्रसाल ने मस्तानी का विवाह बाजीराव से कर दिया था।
लेखक नोट: यह लेख ऐतिहासिक तथ्यों, प्रमुख संधियों और सैन्य रणनीतियों के गहन अध्ययन पर आधारित है, जिसका उद्देश्य बाजीराव पेशवा के अदम्य साहस को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।


