विश्व पर्यावरण दिवस और हिंदू धर्म

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विश्व पर्यावरण दिवस और हिंदू धर्म
विश्व पर्यावरण दिवस और हिंदू धर्म

विश्व पर्यावरण दिवस और हिंदू धर्म: प्रकृति के साथ एकाकार का सनातन संदेश

हर वर्ष 5 जून को संपूर्ण विश्व में ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ (World Environment Day) मनाया जाता है। आधुनिक युग में औद्योगीकरण, प्रदूषण, और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) जैसी गंभीर समस्याओं के कारण पर्यावरण संरक्षण एक वैश्विक आवश्यकता बन गया है। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने 1972 में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए इस दिवस की शुरुआत की थी।

परंतु, यदि हम भारतीय उपमहाद्वीप और विशेष रूप से हिंदू धर्म (सनातन धर्म) के प्राचीन संदर्भों का अवलोकन करें, तो हम पाते हैं कि पर्यावरण संरक्षण कोई आधुनिक विचार नहीं है। हिंदू धर्म में प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि एक ‘जीवित सत्ता’ और ‘माता’ के रूप में पूजा जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों, वेदों, पुराणों और उपनिषदों में पर्यावरण के कण-कण में ईश्वर का वास माना गया है।

यह लेख विश्व पर्यावरण दिवस के परिप्रेक्ष्य में हिंदू धर्म के उन प्राचीन संदर्भों, श्लोकों, और मान्यताओं पर विस्तृत प्रकाश डालता है, जो आज के समय में मानवता के लिए सबसे बड़ा मार्गदर्शन बन सकते हैं।

पञ्चमहाभूत: सृष्टि का आधार

हिंदू दर्शन की नींव इस मान्यता पर टिकी है कि संपूर्ण ब्रह्मांड और मानव शरीर ‘पञ्चमहाभूत’ (पांच मूल तत्वों) से बना है। ये पांच तत्व हैं:

  1. पृथ्वी (Earth)

  2. जल (Water)

  3. अग्नि (Fire)

  4. वायु (Air)

  5. आकाश (Space)

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं:

“क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम शरीरा॥”

इसका अर्थ है कि यह शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु—इन पांच तत्वों से मिलकर बना है। जब हमारा शरीर ही प्रकृति के इन तत्वों से निर्मित है, तो प्रकृति को नुकसान पहुँचाना सीधे तौर पर स्वयं को नुकसान पहुँचाना है। हिंदू धर्म सिखाता है कि मृत्यु के पश्चात शरीर इन्हीं पांच तत्वों में विलीन हो जाता है, इसलिए इन तत्वों की शुद्धता बनाए रखना मनुष्य का परम धर्म है।

वेदों में पर्यावरण संरक्षण: प्राचीन संदर्भ और श्लोक

वेद विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ माने जाते हैं, और इनमें प्रकृति व पर्यावरण के बीच के गहरे संबंध को बहुत ही वैज्ञानिक और आध्यात्मिक ढंग से समझाया गया है।

1. अथर्ववेद और ‘भूमि सूक्त’ (Bhumi Sukta)

अथर्ववेद का ‘भूमि सूक्त’ संभवतः मानव इतिहास का सबसे पहला और महान पर्यावरण घोषणापत्र (Environmental Manifesto) है। इसमें 63 मंत्र हैं जो पूरी तरह से पृथ्वी के सम्मान में समर्पित हैं।

प्रमुख श्लोक:

“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” (अथर्ववेद 12.1.12) अर्थ: भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ।

जब पृथ्वी को माता का दर्जा दिया जाता है, तो उसके शोषण का विचार ही समाप्त हो जाता है। एक पुत्र अपनी माता का केवल पोषण कर सकता है, उसका विनाश नहीं।

एक अन्य श्लोक में मनुष्य पृथ्वी से प्रार्थना करता है:

“यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः। यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु॥” (अथर्ववेद 12.1.3) अर्थ: जिस भूमि पर महासागर, नदियाँ और जल विद्यमान हैं; जिसमें अन्न उपजता है और कृषि होती है; जिसमें श्वास लेने वाले और चलने-फिरने वाले जीव रहते हैं—वह भूमि हमें प्रथम पेय (पोषण) प्रदान करे।

2. ईशावास्योपनिषद: प्रकृति के संसाधनों का संयमित उपयोग

आधुनिक पर्यावरण संकट का सबसे बड़ा कारण है—मनुष्य का लालच और संसाधनों का अंधाधुंध दोहन। इसके निवारण का सूत्र ईशावास्योपनिषद के प्रथम श्लोक में ही दे दिया गया है:

“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥” अर्थ: इस चराचर जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। इसलिए, त्याग-भाव से इसका उपभोग करो। किसी अन्य के धन (या प्रकृति की संपदा) का लालच मत करो।

यह श्लोक ‘सतत विकास’ (Sustainable Development) का सबसे प्राचीन रूप है, जो सिखाता है कि प्रकृति का उपयोग केवल अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए करो, लालच के लिए नहीं।

3. शांति मंत्र: संपूर्ण ब्रह्मांड की शांति की कामना

हिंदू पूजा पद्धति का अंत प्रायः ‘शांति पाठ’ से होता है। यजुर्वेद के इस मंत्र में केवल मनुष्य की नहीं, बल्कि संपूर्ण पर्यावरण और अंतरिक्ष की शांति की प्रार्थना की गई है:

“ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्वं शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥” अर्थ: द्युलोक (स्वर्ग) में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हो, जल में शांति हो, औषधियों और वनस्पतियों (पेड़-पौधों) में शांति हो। सभी देवता, ब्रह्म और संपूर्ण जगत में शांति हो।

यह मंत्र स्पष्ट करता है कि मानव की शांति सीधे तौर पर प्रकृति (जल, वनस्पति, अंतरिक्ष) की शांति (संतुलन) पर निर्भर है।

वनस्पति और वृक्षारोपण का महत्त्व

हिंदू धर्म में वृक्षों को काटना पाप और वृक्षारोपण को सबसे बड़ा पुण्य माना गया है। पीपल, बरगद, नीम, तुलसी, और शमी जैसे पौधों को देवतुल्य मानकर उनकी पूजा की जाती है। विज्ञान भी मानता है कि पीपल और तुलसी सबसे अधिक ऑक्सीजन उत्सर्जित करते हैं।

मत्स्य पुराण का एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रेरणादायक श्लोक वृक्षों के महत्त्व को इस प्रकार दर्शाता है:

“दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो ह्रदः। दशह्रदसमः पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः॥” अर्थ: दस कुओं के बराबर एक बावड़ी (तालाब) होती है, दस बावड़ियों के बराबर एक सरोवर होता है, दस सरोवरों के बराबर एक सुयोग्य पुत्र होता है, और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है।

यह श्लोक आज के ‘ग्लोबल वार्मिंग’ (Global Warming) के युग में वृक्षारोपण के लिए सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत है। प्राचीन भारत में ‘तपोवन’ और ‘देवराई’ (Sacred Groves) की संकल्पना थी, जहां जंगलों के कुछ हिस्सों को देवताओं का मानकर वहां से एक भी पत्ता तोड़ना वर्जित था। यह वन संरक्षण का अद्भुत तरीका था।

जल और नदियों का संरक्षण

आज जल संकट और नदियों का प्रदूषण विश्व के सामने एक विकराल रूप ले चुका है। लेकिन हिंदू धर्म में नदियों को ‘लोकमाता’ कहा गया है। गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, और सरस्वती जैसी नदियां पूजनीय हैं।

ऋग्वेद के ‘नदी स्तुति सूक्त’ में नदियों का विस्तृत वर्णन और वंदना है। जल को पवित्र मानते हुए उसे दूषित न करने का स्पष्ट निर्देश शास्त्रों में मिलता है:

“आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥” (ऋग्वेद 10.9.1) अर्थ: हे जल! आप ही हमारे जीवन के स्रोत हैं। आप हमें ऊर्जा, स्वास्थ्य और असीम आनंद प्रदान करें।

प्राचीन स्मृतियों (जैसे मनुस्मृति) में स्पष्ट रूप से जल स्रोतों में मल-मूत्र त्यागने, कचरा फेंकने या उसे विषैला बनाने पर कठोर दंड का प्रावधान किया गया था। आज विश्व पर्यावरण दिवस पर यदि हम केवल अपनी नदियों को स्वच्छ रखने का संकल्प ले लें, तो यह हिंदू धर्म के वास्तविक आचरण का पालन होगा।

वन्यजीव संरक्षण और अहिंसा

हिंदू दर्शन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) में विश्वास रखता है। इसमें पशु-पक्षियों को भी परिवार का हिस्सा माना गया है। भगवान विष्णु के दशावतारों में से पहले चार अवतार—मत्स्य (मछली), कूर्म (कछुआ), वराह (जंगली सूअर), और नृसिंह (आधा नर, आधा सिंह)—हमें यह सिखाते हैं कि पशुओं में भी ईश्वर का अंश है और वे विकास क्रम का हिस्सा हैं।

प्रत्येक देवी-देवता के साथ एक पशु या पक्षी को वाहन (जैसे शिव जी के साथ नंदी बैल, माँ दुर्गा के साथ सिंह, भगवान विष्णु के साथ गरुड़, कार्तिकेय के साथ मोर) के रूप में जोड़ा गया है। इसका मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक उद्देश्य वन्यजीवों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करना और उनका शिकार रोकना था। ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का सिद्धांत पर्यावरण और उसके जीवों की रक्षा का ही संदेश है।

आधुनिक युग में हिंदू दर्शन की प्रासंगिकता

आज जब दुनिया कार्बन फुटप्रिंट (Carbon Footprint), ओजोन परत में छेद (Ozone Depletion) और प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic Pollution) से जूझ रही है, विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक ‘सेमिनार’ या ‘जागरूकता रैली’ का दिन बनकर रह गया है।

आधुनिक नीतियां तब तक सफल नहीं हो सकतीं जब तक पर्यावरण संरक्षण मनुष्य के आंतरिक स्वभाव और संस्कारों का हिस्सा न बन जाए। हिंदू धर्म पर्यावरण को विज्ञान के साथ-साथ ‘अध्यात्म’ से जोड़ता है। जब एक व्यक्ति सूर्य को अर्घ्य देता है, तो वह सौर ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। जब वह तुलसी के पौधे को जल चढ़ाता है, तो वह वनस्पति जगत का सम्मान करता है।

महात्मा गांधी ने उपनिषदों से प्रेरित होकर ही कहा था— “पृथ्वी के पास हर व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन किसी के लालच को पूरा करने के लिए नहीं।”

काव्यात्मक रचना: प्रकृति और सनातन धर्म का स्वर

विश्व पर्यावरण दिवस के पावन अवसर पर प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी और सनातन धर्म के संदेश को पिरोती हुई यह स्वरचित कविता प्रस्तुत है:

“प्रकृति का क्रंदन और सनातन का नंदन”

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा, जिनसे रचा यह देह-बसेरा। आज वही तत्व हैं संकट में, मानव फंसा है स्वार्थ के फेरा॥

वेद-पुराणों ने जो बतलाया, तरुवर में ईश्वर है समाया। ‘दश पुत्रों सम एक वृक्ष है’, ऋषि-मुनियों ने ज्ञान सिखाया॥

भूल गए हम ‘भूमि सूक्त’ को, जननी को बस साधन माना। काट दिए जंगल सब हमने, नदियों में विष घोल है डाला॥

‘ईशावास्यमिदं’ का मंत्र भुलाकर, लालच की अंधी दौड़ लगाई। देख विकृति इस निज मानव की, प्रकृति माता भी आज रुलाई॥

आओ आज लें प्रण यह हम सब, पांचों तत्व शुद्ध बनाएंगे। पर्यावरण दिवस के अवसर पर, सनातन धर्म निभाएंगे॥

जल, जंगल, ज़मीन बचेंगे, तभी तो हम भी जी पाएंगे। ‘शांति पाठ’ जो पढ़ा वेदों में, उसे यथार्थ कर दिखलाएंगे॥


विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) हमें प्रतिवर्ष यह याद दिलाने आता है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य हमारे वर्तमान कर्मों पर निर्भर करता है। पश्चिम का पर्यावरणवाद (Environmentalism) भले ही कुछ दशक पुराना हो, किंतु भारत और हिंदू धर्म का ‘पारिस्थितिकीय दर्शन’ (Ecological Philosophy) हजारों वर्ष प्राचीन है।

पर्यावरण की रक्षा के लिए हमें केवल आधुनिक तकनीकों की ही नहीं, बल्कि उस प्राचीन वैदिक दृष्टि की भी आवश्यकता है, जो जड़ और चेतन, दोनों में परमात्मा को देखती है। जब हम नदियों को मात्र ‘H2O’ न मानकर जीवनदायिनी गंगा मानेंगे, जब हम वनों को केवल ‘लकड़ी का भंडार’ न मानकर ‘अरण्यनी देवी’ मानेंगे, तभी वास्तविक रूप में धरती का संरक्षण हो सकेगा।

आइए, इस पर्यावरण दिवस पर हम अपने सनातन संस्कारों की ओर लौटें, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ हों, अधिक से अधिक वृक्ष लगाएं और यह उद्घोष करें— “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” (पृथ्वी मेरी माता है, और मैं इसका रक्षक पुत्र हूँ)।

यही विश्व पर्यावरण दिवस का सच्चा उत्सव और हिंदू धर्म का पालन है।

The short URL of the present article is: https://moonfires.com/h81r
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राज पिछले 20 वर्ष से भी अधिक समय से कंटेंट राइटिंग कर रहे हैं। इनको SEO और ब्लॉगिंग का अच्छा अनुभव है। इन्होने एंटरटेनमेंट, जीवनी, शिक्षा, टुटोरिअल, टेक्नोलॉजी, ऑनलाइन अर्निंग, ट्रेवलिंग, निबंध, करेंट अफेयर्स, सामान्य ज्ञान जैसे विविध विषयों पर कई बेहतरीन लेख लिखे हैं। इनके लेख बेहतरीन गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं। Founder Of Moonfires.com
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